सूरत से वो बेज़ार है मा'लूम नहीं क्यूँ
दिल फिर भी तलबगार है मा'लूम नहीं क्यूँ
हर शख़्स को बख़्शी गई तमईज़-ए-बद-ओ-नेक
हर-शख़्स ज़ियाँ-कार है मा'लूम नहीं क्यूँ
इक चीज़ कि सरमाया-ए-राहत है उसे लोग
कहते हैं कि आज़ार है मा'लूम नहीं क्यूँ
पत्ता भी अगर हिलता है तो उस की रज़ा से
और बंदा गुनहगार है मा'लूम नहीं क्यूँ
दीं-दार है ज़ाहिद की ज़बाँ भी मिरा दिल भी
फिर मुफ़्त की तकरार है मा'लूम नहीं क्यूँ
ग़ज़ल
सूरत से वो बेज़ार है मा'लूम नहीं क्यूँ
हरी चंद अख़्तर

