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सूरत से वो बेज़ार है मा'लूम नहीं क्यूँ | शाही शायरी
surat se wo bezar hai malum nahin kyun

ग़ज़ल

सूरत से वो बेज़ार है मा'लूम नहीं क्यूँ

हरी चंद अख़्तर

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सूरत से वो बेज़ार है मा'लूम नहीं क्यूँ
दिल फिर भी तलबगार है मा'लूम नहीं क्यूँ

हर शख़्स को बख़्शी गई तमईज़-ए-बद-ओ-नेक
हर-शख़्स ज़ियाँ-कार है मा'लूम नहीं क्यूँ

इक चीज़ कि सरमाया-ए-राहत है उसे लोग
कहते हैं कि आज़ार है मा'लूम नहीं क्यूँ

पत्ता भी अगर हिलता है तो उस की रज़ा से
और बंदा गुनहगार है मा'लूम नहीं क्यूँ

दीं-दार है ज़ाहिद की ज़बाँ भी मिरा दिल भी
फिर मुफ़्त की तकरार है मा'लूम नहीं क्यूँ