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सूरत-ए-सहर जाऊँ और दर-ब-दर जाऊँ | शाही शायरी
surat-e-sahar jaun aur dar-ba-dar jaun

ग़ज़ल

सूरत-ए-सहर जाऊँ और दर-ब-दर जाऊँ

एजाज़ गुल

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सूरत-ए-सहर जाऊँ और दर-ब-दर जाऊँ
अब तो फ़ैसला ठहरा रात से गुज़र जाऊँ

वाहिमों के ज़िंदाँ का ज़ेहन ज़ेहन क़ैदी है
बोल फ़िक्र-ए-ताबिंदा मैं किधर किधर जाऊँ

मेरी ना-रसाई से क़ाफ़िला न रुक जाए
मैं कि पा-शिकस्ता हूँ रास्ते में मर जाऊँ

इश्क़ की सदाक़त पर जबकि मेरा ईमाँ है
कैसे ख़ुद-कुशी कर लूँ क्यूँ बिखर बिखर जाऊँ