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सुनोगे मुझ से मेरा माजरा क्या | शाही शायरी
sunoge mujhse mera majra kya

ग़ज़ल

सुनोगे मुझ से मेरा माजरा क्या

इस्माइल मेरठी

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सुनोगे मुझ से मेरा माजरा क्या
कहा करते हैं अफ़्सानों में क्या क्या

नहीं तशवीश-ए-आइंदा कि हो कब
गुज़िश्ता का तहय्युर है कि था क्या

न कर तफ़तीश है ख़ल्वत-नशीं कौन
तअम्मुल कर कि है ये बरमला क्या

है इक आईना-ख़ाना बज़्म-ए-कसरत
बताऊँ ग़ैर किस को मा-सिवा क्या

फ़क़त मज़कूर है इक निस्बत-ए-ख़ास
मुक़द्दर है ख़बर क्या मुब्तदा क्या

जहाँ नक़्श-ए-क़दम हो रूह-ए-क़ुदसी
वहाँ पहुँचेगी अक़्ल-ए-ना-रसा क्या

लगाऊँ शैअन-लिल्लाह की सदा क्यूँ
भुला दूँ यफ़अ'लुल्लाह-मा-यशा क्या