सुनोगे मुझ से मेरा माजरा क्या
कहा करते हैं अफ़्सानों में क्या क्या
नहीं तशवीश-ए-आइंदा कि हो कब
गुज़िश्ता का तहय्युर है कि था क्या
न कर तफ़तीश है ख़ल्वत-नशीं कौन
तअम्मुल कर कि है ये बरमला क्या
है इक आईना-ख़ाना बज़्म-ए-कसरत
बताऊँ ग़ैर किस को मा-सिवा क्या
फ़क़त मज़कूर है इक निस्बत-ए-ख़ास
मुक़द्दर है ख़बर क्या मुब्तदा क्या
जहाँ नक़्श-ए-क़दम हो रूह-ए-क़ुदसी
वहाँ पहुँचेगी अक़्ल-ए-ना-रसा क्या
लगाऊँ शैअन-लिल्लाह की सदा क्यूँ
भुला दूँ यफ़अ'लुल्लाह-मा-यशा क्या
ग़ज़ल
सुनोगे मुझ से मेरा माजरा क्या
इस्माइल मेरठी

