EN اردو
सुकूत-ए-शाम-ए-ख़िज़ाँ है क़रीब आ जाओ | शाही शायरी
sukut-e-sham-e-KHizan hai qarib aa jao

ग़ज़ल

सुकूत-ए-शाम-ए-ख़िज़ाँ है क़रीब आ जाओ

अहमद फ़राज़

;

सुकूत-ए-शाम-ए-ख़िज़ाँ है क़रीब आ जाओ
बड़ा उदास समाँ है क़रीब आ जाओ

न तुम को ख़ुद पे भरोसा न हम को ज़ोम-ए-वफ़ा
न ए'तिबार-ए-जहाँ है क़रीब आ जाओ

रह-ए-तलब में किसी को किसी का ध्यान नहीं
हुजूम-ए-हम-सफ़राँ है क़रीब आ जाओ

जो दश्त-ए-इश्क़ में बिछड़े वो उम्र भर न मिले
यहाँ धुआँ ही धुआँ है क़रीब आ जाओ

ये आँधियाँ हैं तो शहर-ए-वफ़ा की ख़ैर नहीं
ज़माना ख़ाक-फ़िशाँ है क़रीब आ जाओ

फ़क़ीह-ए-शहर की मज्लिस नहीं कि दूर रहो
ये बज़्म-ए-पीर-ए-मुग़ाँ है क़रीब आ जाओ

'फ़राज़' दूर के सूरज ग़ुरूब समझे गए
ये दौर-ए-कम-नज़राँ है क़रीब आ जाओ