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सुख़न की दिलकशी सोज़-ए-दिली लगती नहीं मुझ को | शाही शायरी
suKHan ki dilkashi soz-e-dili lagti nahin mujhko

ग़ज़ल

सुख़न की दिलकशी सोज़-ए-दिली लगती नहीं मुझ को

सय्यद अमीन अशरफ़

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सुख़न की दिलकशी सोज़-ए-दिली लगती नहीं मुझ को
ये लफ्फ़ाज़ी तो जी की बेकली लगती नहीं मुझ को

ये सच है क़ुव्वत-ए-तस्ख़ीर होती है मोहब्बत में
ज़फ़र-याबी मगर हर्फ़-ए-जली लगती नहीं मुझ को

किसी शय की कमी लगती है इन अफ़्सुर्दा राहों में
उसी का शहर लेकिन वो गली लगती नहीं मुझ को

ख़िज़ाँ-बख़्ती में कब शाख़-ए-चमन पर फूल खिलते हैं
हँसी अहबाब की ज़िंदा-दिली लगती नहीं मुझ को

ब-ज़ाहिर बाग़-ओ-बाज़ार-ओ-मकाँ सब लहलहाते हैं
ये हरियाली मगर फूली-फली लगती नहीं मुझ को

किसी आब-ए-रवाँ पर ख़ूबसूरत नाव काग़ज़ की
वही दुनिया है लेकिन क्यूँ भली लगती नहीं मुझ को

मुलम्मा'-कारियाँ अशिया में भी इंसान में भी हैं
ज़मीं फ़ितरत के साँचे में ढली लगती नहीं मुझ को

क़लंदर ख़ानक़ाह-ओ-मदरसा में मस्त है लेकिन
ये मस्ती फ़क़्र-ए-बू-बकर-ओ-अली लगती नहीं मुझ को