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सुबूत-ए-इश्तियाक़-ए-हम-रही लाओ तो आओ | शाही शायरी
subut-e-ishtiyaq-e-ham-rahi lao to aao

ग़ज़ल

सुबूत-ए-इश्तियाक़-ए-हम-रही लाओ तो आओ

जलील ’आली’

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सुबूत-ए-इश्तियाक़-ए-हम-रही लाओ तो आओ
हिसार-ए-ज़ात से बाहर निकल पाओ तो आओ

ज़मानों से फ़क़त लहरें गुमानों की गिनो हो
किसी दिन तुम ये दरिया पार कर जाओ तो आओ

हद-ए-ख़्वाहिश में जीना है तो जाओ राह अपनी
न दश्त-ए-शौक़ की वुसअत से घबराओ तो आओ

अजब बे-इख़्तियाराना थी हर आमद तुम्हारी
इसी मौज-ए-मोहब्बत में कभी आओ तो आओ

ये दरवेशों की दुनिया है करिश्मे इस के देखो
जहाँ से ही नहीं ख़ुद से भी उक्ताओ तो आओ

रिफ़ाक़त अहल-ए-ग़म की इक नशात-ए-मुख़्तलिफ़ है
जो रखते हो जिगर में दर्द का घाव तो आओ

हमें इस हिकमत-ए-दौराँ का इक नुक्ता बहुत है
अगर धुन है उलट दें वक़्त के दाओ तो आओ