सुबूत-ए-इश्तियाक़-ए-हम-रही लाओ तो आओ
हिसार-ए-ज़ात से बाहर निकल पाओ तो आओ
ज़मानों से फ़क़त लहरें गुमानों की गिनो हो
किसी दिन तुम ये दरिया पार कर जाओ तो आओ
हद-ए-ख़्वाहिश में जीना है तो जाओ राह अपनी
न दश्त-ए-शौक़ की वुसअत से घबराओ तो आओ
अजब बे-इख़्तियाराना थी हर आमद तुम्हारी
इसी मौज-ए-मोहब्बत में कभी आओ तो आओ
ये दरवेशों की दुनिया है करिश्मे इस के देखो
जहाँ से ही नहीं ख़ुद से भी उक्ताओ तो आओ
रिफ़ाक़त अहल-ए-ग़म की इक नशात-ए-मुख़्तलिफ़ है
जो रखते हो जिगर में दर्द का घाव तो आओ
हमें इस हिकमत-ए-दौराँ का इक नुक्ता बहुत है
अगर धुन है उलट दें वक़्त के दाओ तो आओ
ग़ज़ल
सुबूत-ए-इश्तियाक़-ए-हम-रही लाओ तो आओ
जलील ’आली’

