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सुबू पर जाम पर शीशे पे पैमाने पे क्या गुज़री | शाही शायरी
subu par jam par shishe pe paimane pe kya guzri

ग़ज़ल

सुबू पर जाम पर शीशे पे पैमाने पे क्या गुज़री

सीमाब अकबराबादी

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सुबू पर जाम पर शीशे पे पैमाने पे क्या गुज़री
न जाने मैं ने तौबा की तो मय-ख़ाने पे क्या गुज़री

मिलें तो फ़ाइज़ान-ए-मंज़िल-ए-मक़्सूद से पूछूँ
गुज़रगाह-ए-मोहब्बत से गुज़र जाने पे क्या गुज़री

किसी को मेरे काशाने से हमदर्दी नहीं शायद
हर इक ये पूछता है मेरे काशाने पे क्या गुज़री

न हो जो ज़िंदगी अंजाम वो विज्दान-ए-नाक़िस है
हुज़ूर-ए-शम्म'अ बाद-ए-वज्द परवाने पे क्या गुज़री

बताएँ बरहमन और शैख़ उन की ख़ाना-जंगी में
ख़ुदा-ख़ाने पे क्या बीती सनम-ख़ाने पे क्या गुज़री

तू अपने ही मआल-ए-सोज़-ए-ग़म पर ग़ौर कर पहले
तुझे इस से नहीं कुछ बहस परवाने पे क्या गुज़री

किसी हिकमत से कर दे कोई गोया मरने वालों को
ये राज़ अब तक है सर-बस्ता कि मर जाने पे क्या गुज़री

तिरी हर सू तजल्ली और मेरी हर तरफ़ नज़रें
तुझे तो याद होगा आईना-ख़ाने पे क्या गुज़री

ज़बाँ मुँह में है अर्ज़-ए-हाल कर तू ने तो देखा है
कि ख़ू-ए-ज़ब्त-ओ-ख़ामोशी से परवाने पे क्या गुज़री

वो कहता था ख़ुदा जाने बहार आए तो क्या गुज़रे
ख़ुदा जाने बहार आई तो दीवाने पे क्या गुज़री

ये है 'सीमाब' इक ना-गुफ़्ता ब-अफ़्साना क्या कहिए
वतन से कुंज-ए-ग़ुर्बत में चले आने पे क्या गुज़री