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सुब्ह-ए-वफ़ा से हिज्र का लम्हा जुदा करो | शाही शायरी
subh-e-wafa se hijr ka lamha juda karo

ग़ज़ल

सुब्ह-ए-वफ़ा से हिज्र का लम्हा जुदा करो

शाहीन अब्बास

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सुब्ह-ए-वफ़ा से हिज्र का लम्हा जुदा करो
मंज़िल से गर्द, गर्द से रस्ता जुदा करो

इक नक़्श हो न पाए इधर से उधर मिरा
जैसा तुम्हें मिला था मैं वैसा जुदा करो

शब-ज़ाद-गाँ! तुम अहल-ए-ख़बर से नहीं सो तुम!
अपना मदार अपना मदीना जुदा करो

याँ पय-ब-पय जो ख़्वाब खुले नै-ब-नै खुले
जितना जुदा ये हो सके उतना जुदा करो

मैं था कि अपने-आप में ख़ाली सा हो गया
उस ने तो कह दिया मिरा हिस्सा जुदा करो