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सुब्ह भी होती रही महताब भी ढलता रहा | शाही शायरी
subh bhi hoti rahi mahtab bhi Dhalta raha

ग़ज़ल

सुब्ह भी होती रही महताब भी ढलता रहा

अतहर शकील

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सुब्ह भी होती रही महताब भी ढलता रहा
ज़िंदगी का कारवाँ चलता रहा चलता रहा

सानेहा क्या उस पे गुज़रा कौन उठ कर देखता
अहल-ए-ख़ाना सो गए लेकिन दिया जलता रहा

मेरे ख़्वाबों की कोई बुनियाद भी थी क्या कहूँ
बर्फ़ का पर्बत था इक गलता रहा गलता रहा

आख़िरी वक़्त आ गया तो सोचता हूँ दोस्तो
आज का जो मसअला था कल पे क्यूँ टलता रहा

सामने के दुश्मनों से बच के रहना सहल था
आस्तीं का साँप था बढ़ता रहा पलता रहा

हादसे की वो कहानी मुख़्तसर सी है 'शकील'
बाँसुरी भी बज रही थी शहर भी जलता रहा