EN اردو
सोज़-ए-ग़म भी नहीं फ़ुग़ाँ भी नहीं | शाही शायरी
soz-e-gham bhi nahin fughan bhi nahin

ग़ज़ल

सोज़-ए-ग़म भी नहीं फ़ुग़ाँ भी नहीं

सुरूर बाराबंकवी

;

सोज़-ए-ग़म भी नहीं फ़ुग़ाँ भी नहीं
जल बुझी आग अब धुआँ भी नहीं

तू ब-ज़ाहिर वो मेहरबाँ भी नहीं
मन्नतें मेरी राएगाँ भी नहीं

जाने क्यूँ तुम से कुछ नहीं कहते
वर्ना हम इतने बे-ज़बाँ भी नहीं

वो निगाहें कि बे-नियाज़ भी हैं
और उन से कहीं अमाँ भी नहीं

दीदा-ओ-दिल हैं कब से चश्म-ब-राह
कोई उफ़्ताद-ए-ना-गहाँ भी नहीं

ऐ ख़ुशा कारोबार-ए-शौक़ 'सुरूर'
नफ़अ' कुछ हो न हो ज़ियाँ भी नहीं