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सोहबत-ए-मयकशी सरसरी रह गई | शाही शायरी
sohbat-e-mai-kashi sarsari rah gai

ग़ज़ल

सोहबत-ए-मयकशी सरसरी रह गई

मंज़ूर हुसैन शोर

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सोहबत-ए-मयकशी सरसरी रह गई
और जो मीना भरी थी भरी रह गई

क्या ग़ज़ब है नशेमन सुलगता रहा
और शाख़-ए-नशेमन हरी रह गई

आख़िरश काम आ ही गई ख़ामुशी
लफ़्ज़-ओ-मा'नी की पर्दा-दरी रह गई

हर नज़र बन गई अपने सीने का तीर
इक ख़लिश बन के दीदा-दरी रह गई

नस्ल-ए-आदम से इतने उठे किर्दगार
अपने लब सी के पैग़म्बरी रह गई

आदमी का ख़ुदा बन गया आदमी
दावर-ए-हश्र की दावरी रह गई

मेरा हर नक़्श-ए-पा बन गया संग-ए-मील
ख़िज़र की ज़हमत-ए-रहबरी रह गई

'शोर' दामान-ए-ग़म हो गया तार तार
हर मसर्रत की बख़िया-गरी रह गई