सोहबत-ए-मयकशी सरसरी रह गई
वो जो मीना भरी थी भरी रह गई
क्या ग़ज़ब है नशेमन सुलगता रहा
और शाख़-ए-नशेमन हरी रह गई
आख़िरश काम आ ही गई ख़ामुशी
लफ़्ज़-ओ-मा'नी की पर्दा-दरी रह गई
हर नज़र बन गई अपने सीने का तीर
इक ख़लिश बन के दीदा-वरी रह गई
नस्ल-ए-आदम से इतने उठे किर्दगार
अपने लब सी के पैग़म्बरी रह गई
मेरा हर नक़्श-ए-पा बन गया संग-ए-मील
ख़िज़्र की ज़हमत-ए-रहबरी रह गई
शोर-ए-दामान-ए-ग़म हो गया तार तार
हर मसर्रत की बख़िया-गरी रह गई
ग़ज़ल
सोहबत-ए-मयकशी सरसरी रह गई
मंज़ूर हुसैन शोर

