सोचना रूह में काँटे से बिछाए रखना
ये भी क्या साँस की तलवार बनाए रखना
अब तो ये रस्म है ख़ुश्बू के क़सीदे पढ़ना
फूल गुल-दान में काग़ज़ के सजाए रखना
तीरगी टूट पड़े भी तो बुरा मत कहियो
हो सके गर तो चराग़ों को जलाए रखना
राह में भीड़ भी पड़ती है अभी से सुन लो
हाथ से हाथ मिला है तो मिलाए रखना
कितना आसान है ताईद की ख़ू कर लेना
कितना दुश्वार है अपनी कोई राय रखना
कोई तख़्लीक़ भी तकमील न पाए मिरी
नज़्म लिख लूँ तो मुझे नाम न आए रखना
अपनी परछाईं से मुँह मोड़ न लेना 'अनवर'
तुम उसे आज भी बातों में लगाए रखना
ग़ज़ल
सोचना रूह में काँटे से बिछाए रखना
अनवर मसूद

