EN اردو
सोच में तेरे सुना रात जो खटका-पटका | शाही शायरी
soch mein tere suna raat jo khaTka-paTka

ग़ज़ल

सोच में तेरे सुना रात जो खटका-पटका

मिर्ज़ा अज़फ़री

;

सोच में तेरे सुना रात जो खटका-पटका
सर को तकिए से उठा पट्टी पे दे दे पटका

तू ने गर कंघी जो काकुल को पकड़ कर झटका
दिल पड़ा फिरता है सर मारता भूला-भटका

लख़्त-ए-दिल आ सर-ए-मिज़्गाँ पे लटकते हैं पड़े
तेरी उल्फ़त ने भला साँग दिखाया नट का

जब न तब बोसे पे हटते हो कि दूँगा न कभी
मान कर ये न मिरी जान फिर ऐसी हट का

क्यूँ तिरी चाल लटक देख के दिल लटके हैं
कुछ तो हम को भी बता किस से ये सीखा लटका

नट-खटी देख तिरी मैं तो अचंभे में रहा
दिल झपट हाथ से झट राग सुनाया खटका

घर बसे बोल भी कुछ क्या है ख़राबी ठानी
कब तलक हम से फिरेगा यूँही फटका फटका

दिल-ए-गुम-गश्ता की हर इक से मैं करता हूँ तलाश
चोर जो था वही आँखों को चुरा कर सटका