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सियाही गिरती रहे और दिया ख़राब न हो | शाही शायरी
siyahi girti rahe aur diya KHarab na ho

ग़ज़ल

सियाही गिरती रहे और दिया ख़राब न हो

शाहीन अब्बास

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सियाही गिरती रहे और दिया ख़राब न हो
ये ताक़-ए-चश्म अब इतना भी क्या ख़राब न हो

हर आने वाला इसी तरह से तुझे चाहे
मिरी बनाई हुई ये फ़ज़ा ख़राब न हो

अज़ल अबद में ठनी है सो मैं निकलता हूँ
मिरी कड़ी से तिरा सिलसिला ख़राब न हो

हम उस हवा से तो कहते हैं क्यूँ बुझाया चराग़
कहीं चराग़ की अपनी हवा ख़राब न हो

मैं अपनी शर्त पे आया था इस ख़राबे में
सो मेरे साथ कोई दूसरा ख़राब न हो

मिरी ख़राबी को यकजा करो कहीं न कहीं
मिरा मुआ'मला अब जा-ब-जा ख़राब न हो

ख़राब हूँ भले इस इश्तिहा में हम और तुम
पर एक दूसरे का ज़ाइक़ा ख़राब न हो