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सियाह रात की सब आज़माइशें मंज़ूर | शाही शायरी
siyah raat ki sab aazmaishen manzur

ग़ज़ल

सियाह रात की सब आज़माइशें मंज़ूर

आल-ए-अहमद सूरूर

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सियाह रात की सब आज़माइशें मंज़ूर
किसी सहर के उजाले का आसरा तो मिला

नज़र मिला न सके हम से वो तो ग़म क्या है
कि दिल से दिल के धड़कने का सिलसिला तो मिला

है आज और ही कुछ ज़ुल्फ़-ए-ताबदार में ख़म
भटकने वाले को मंज़िल का रास्ता तो मिला

सरिश्क-ए-चश्म से मोती बहुत लुटाए गए
तिरी निगह के शहीदों को ख़ूँ-बहा तो मिला

जहाँ निगाह से इंसाँ बनाए जाते हैं
वो बाब-ए-मय-कदा मेरे लिए खुला तो मिला

सितम-ज़रीफ़ मोहब्बत को जुर्म कहते हैं
गुनाह-गार को जीने का आसरा तो मिला

न रहनुमा है न मंज़िल दयार-ए-उल्फ़त में
क़दम उठाते ही ख़िज़्र-ए-शिकस्ता-पा तो मिला

मिरे जुनूँ ने खिलाए हैं फूल सहरा में
मिरे जुनूँ से बहारों को हौसला तो मिला

समझते थे कि वफ़ा-ना-शनास है दुनिया
'सुरूर' हम को भी इक दर्द-आश्ना तो मिला