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सियाह-ख़ाना-ए-उम्मीद-ए-राएगाँ से निकल | शाही शायरी
siyah-KHana-e-ummid-e-raegan se nikal

ग़ज़ल

सियाह-ख़ाना-ए-उम्मीद-ए-राएगाँ से निकल

राजेन्द्र मनचंदा बानी

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सियाह-ख़ाना-ए-उम्मीद-ए-राएगाँ से निकल
खुली फ़ज़ा में ज़रा आ ग़ुबार-ए-जाँ से निकल

अजीब भीड़ यहाँ जम्अ है यहाँ से निकल
कहीं भी चल मगर इस शहर-ए-बे-अमाँ से निकल

इक और राह उधर देख जा रही है वहीं
ये लोग आते रहेंगे तू दरमियाँ से निकल

ज़रा बढ़ा तो सही वाक़िआत को आगे
तिलिस्म-कारी-ए-आग़ाज़-ए-दास्ताँ से निकल

तू कोई ग़म है तो दिल में जगह बना अपनी
तू इक सदा है तो एहसास की कमाँ से निकल

यहीं कहीं तिरा दुश्मन छुपा है ऐ 'बानी'
कोई बहाना बना बज़्म-ए-दोस्ताँ से निकल