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सितम-गर को मैं चारा-गर कह रहा हूँ | शाही शायरी
sitam-gar ko main chaara-gar kah raha hun

ग़ज़ल

सितम-गर को मैं चारा-गर कह रहा हूँ

शाद आरफ़ी

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सितम-गर को मैं चारा-गर कह रहा हूँ
ग़लत कह रहा हूँ मगर कह रहा हूँ

बुतों में उसे जल्वा-गर कह रहा हूँ
बड़ी बात है मुख़्तसर कह रहा हूँ

मुझे आज काँटों के मुँह चूमने दो
बहारों का रुख़ देख कर कह रहा हूँ

ये माथे पे शिकनें ये दाँतों में आँचल
तो अफ़्साना-ए-मो'तबर कह रहा हूँ

उसी वक़्त आती हैं चेहरे पे ज़ुल्फ़ें
उन्हें जब में नूर-ए-सहर कह रहा हूँ

ज़माने के मुँह पर ज़माने की बातें
समझने लगा हूँ अगर कह रहा हूँ

ये दीवानगी है कि हालात हाएल
वो सुनते नहीं हैं मगर कह रहा हूँ

इताब ओ तग़ाफ़ुल ही अच्छे थे मुझ को
मआल-ए-करम देख कर कह रहा हूँ

जभी 'शाद' शाएर को कहते हैं झूटा
ख़िज़ाँ में भी मैं शेर-ए-तर कह रहा हूँ