सिलसिला-जुम्बान-ए-वहशत में नई तदबीर से
तौक़ मन्नत के बदलते हैं मिरी ज़ंजीर से
आप ले जाएँ उन्हें या दिल के टुकड़े जोड़ दें
मेरी ख़ातिर जम्अ' हो जाए किसी तदबीर से
नज़्अ' में भी की गईं हम पर बहुत सी सख़्तियाँ
सैकड़ों तूफ़ाँ उठे अाब-ए-दम-ए-शमशीर से
नज़्अ' में हैं पाँव मेरे कू-ए-जानाँ की तरफ़
चाहता हूँ मैं पहुँच जाऊँ किसी तदबीर से
इक नज़र इंसाफ़ से कीजे ज़रा सू-ए-'रशीद'
आशिक़ाना क्या ग़ज़ल अब हो सके इस पीर से
ग़ज़ल
सिलसिला-जुम्बान-ए-वहशत में नई तदबीर से
रशीद लखनवी

