सीना-ए-शाइ'र ग़म से भरा है आँख मगर नमनाक नहीं है
रोज़-ए-अज़ल से है दीवाना दामन लेकिन चाक नहीं है
हिज्र के ग़म में रोने वाले तेरा अलम दुनिया की नज़र में
कल भी इबरत-नाक नहीं था आज भी इबरत-नाक नहीं है
शिकवा-ब-लब वो रिंद हैं साक़ी आज भी तेरे मयख़ाने में
तिश्ना-दहन बैठे हैं लेकिन अर्ज़-ए-तलब बेबाक नहीं है
शाइ'र की आवारा तबीअत अस्ल में है तज़ईन-ए-मोहब्बत
नासेह मुशफ़िक़ तुम सब कुछ हो सिर्फ़ यही इदराक नहीं है
तू ही बता हम ऐसे इंसाँ तेरी गली में क्यूँ आते हैं
तेरी अदाएँ शोख़ नहीं हैं तेरी नज़र बेबाक नहीं है
मैं ही क्या कुछ और यगाने मेरी तरह हैं तेरे दिवाने
परवानों की ख़ाक में शामिल लेकिन मेरी ख़ाक नहीं है
तुम ने 'अज़ीज़' उस की महफ़िल में शब न सही लम्हे तू गुज़ारे
मुस्तक़बिल की फ़िक्र तो क्यूँ हो हाल भी हसरत-नाक नहीं है
ग़ज़ल
सीना-ए-शाइ'र ग़म से भरा है आँख मगर नमनाक नहीं है
अज़ीज़ वारसी

