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शुऊ'र चाहिए इज़हार-ओ-आगही के लिए | शाही शायरी
shuur chahiye izhaar-o-agahi ke liye

ग़ज़ल

शुऊ'र चाहिए इज़हार-ओ-आगही के लिए

ऋषि पटियालवी

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शुऊ'र चाहिए इज़हार-ओ-आगही के लिए
ख़ुशी है ग़म के लिए और ग़म ख़ुशी के लिए

हज़ार जल्वे नज़र के लिए हैं आलम में
निगाह-ए-शौक़ है लेकिन किसी किसी के लिए

ज़रा हवाओं के रुख़ पर भी इक नज़र डालें
चराग़ ढूँड रहे हैं जो रौशनी के लिए

किसी ने ये भी न पूछा कि क्या गुज़रती है
हम अपने आप से जाते रहे किसी के लिए

ये राज़ पूछे तो परवाने से कोई पूछे
कि बे-सबब कोई मरता नहीं किसी के लिए

रियाज़-ए-इश्क़ में ऐसी भी इक बहार आई
निगाह-ए-शौक़ ने बोसे कली कली के लिए

किसे ख़बर थी कि ख़ुद रौशनी को तरसेगा
चराग़-ए-इश्क़ जलाया था रौशनी के लिए

उसी का नाम फ़रिश्तों के नाम से चमका
जो आदमी हुआ क़ुर्बान दोस्ती के लिए

हज़ार क़ुदरत-ए-अज़्म-ओ-अमल सही लेकिन
ख़ला का ख़ौफ़ भी लाज़िम है आदमी के लिए

दवा-ए-दर्द अगर आप से नहीं होती
दुआ-ए-मर्ग ही कर जाइए 'रिशी' के लिए