शुऊ'र चाहिए इज़हार-ओ-आगही के लिए
ख़ुशी है ग़म के लिए और ग़म ख़ुशी के लिए
हज़ार जल्वे नज़र के लिए हैं आलम में
निगाह-ए-शौक़ है लेकिन किसी किसी के लिए
ज़रा हवाओं के रुख़ पर भी इक नज़र डालें
चराग़ ढूँड रहे हैं जो रौशनी के लिए
किसी ने ये भी न पूछा कि क्या गुज़रती है
हम अपने आप से जाते रहे किसी के लिए
ये राज़ पूछे तो परवाने से कोई पूछे
कि बे-सबब कोई मरता नहीं किसी के लिए
रियाज़-ए-इश्क़ में ऐसी भी इक बहार आई
निगाह-ए-शौक़ ने बोसे कली कली के लिए
किसे ख़बर थी कि ख़ुद रौशनी को तरसेगा
चराग़-ए-इश्क़ जलाया था रौशनी के लिए
उसी का नाम फ़रिश्तों के नाम से चमका
जो आदमी हुआ क़ुर्बान दोस्ती के लिए
हज़ार क़ुदरत-ए-अज़्म-ओ-अमल सही लेकिन
ख़ला का ख़ौफ़ भी लाज़िम है आदमी के लिए
दवा-ए-दर्द अगर आप से नहीं होती
दुआ-ए-मर्ग ही कर जाइए 'रिशी' के लिए
ग़ज़ल
शुऊ'र चाहिए इज़हार-ओ-आगही के लिए
ऋषि पटियालवी

