शोख़ी उफ़-रे तिरी नज़र की
ये फाँस बनी मिरे जिगर की
ज़ुल्फ़ों ने वहीं बलाएँ ले लीं
रुख़ से जो ज़रा नक़ाब सरकी
क्या पूछते हो शब-ए-जुदाई
जिस तरह से बन पड़ी बसर की
दिल दे के उन्हें मैं देखता हूँ
ये मेरी ख़ता है या नज़र की
निकलें भी तो ये 'अज़ीज़' दिल से
नालों में कमी नहीं असर की
ग़ज़ल
शोख़ी उफ़-रे तिरी नज़र की
अज़ीज़ हैदराबादी

