शोहरत है मेरी सुख़न-वरी की
हिन्दी में है तर्ज़ फ़ारसी की
क्यूँ ज़िक्र-ए-विसाल से ख़फ़ा हो
ये बात तो है हँसी-ख़ुशी की
अल्लाह रे नज़ाकत-ए-लब-ए-यार
बुत-ख़ाने पड़े जो मय-कशी की
शिकवा न करूँ मैं ता-लब-ए-गोर
दुश्मन भी कहे कि दोस्ती की
हो दीदा-ए-मेहर शबनम-अफ़्शाँ
हालत जो दिखाऊँ बे-कसी की
जब मौत किसी तरह न आए
घबरा कर हम ने आशिक़ी की
ख़ामोश हो शम्अ रोते रोते
तक़रीर करूँ जो ख़ामुशी की
ऐ मौत अज़ाब से छुड़ाया
इस क़ैद से तू ने मुख़्लिसी की
बुलबुल को किया असीर-ए-गुल-दाम
सय्याद ने ख़ूब मुंसिफ़ी की
देखा जो वो रश्क-ए-माह-ए-कनआँ
रंगत हुई ज़र-दस्तरी की
पहुँचे न ब-रंग-ए-शाना ता ज़ुल्फ़
क्या बख़्त-ए-सियह ने कोताही की
दोज़ख़ की तरह जलें न ज़ाहिद
जन्नत में भी हम ने मय-कशी की
नाले किए चुपके चुपके रोए
क्या क्या ग़म यार की ख़ुशी की
ग़ूलों ने लहद पे हूँ वो वहशी
आँखों से आ के रौशनी की
ऐ 'अर्श' ख़ुदा-ओ-बुत अहद हैं
मुशरिक को समाई है दुई की
ग़ज़ल
शोहरत है मेरी सुख़न-वरी की
मीर कल्लू अर्श

