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शिकायत हम नहीं करते रिआ'यत वो नहीं करते | शाही शायरी
shikayat hum nahin karte riayat wo nahin karte

ग़ज़ल

शिकायत हम नहीं करते रिआ'यत वो नहीं करते

फ़रह इक़बाल

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शिकायत हम नहीं करते रिआ'यत वो नहीं करते
मगर इस पर सितम कोई वज़ाहत वो नहीं करते

रवाँ हो किस तरह से चाहतों का कारवाँ अपना
हमें रुस्वाई का डर है बग़ावत वो नहीं करते

हमी जल्वा दिखाते हैं हमी शोख़ी निगाहों से
नहीं होता असर फिर भी शरारत वो नहीं करते

नज़र दो-चार हो जाए तो झुक जाती हैं ये पलकें
मगर फिर भी कोई जज़्बा इनायत वो नहीं करते

सबा ले कर पयाम आए या फूलों का सलाम आए
किसी भी मौसम-ए-दिल से मोहब्बत वो नहीं करते

कोई नामा कोई ईमेल मेरे नाम लिख दें वो
मोहब्बत में कभी इतनी भी ज़हमत वो नहीं करते