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शौक़ का सिलसिला बे-कराँ है | शाही शायरी
shauq ka silsila be-karan hai

ग़ज़ल

शौक़ का सिलसिला बे-कराँ है

फ़रीद जावेद

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शौक़ का सिलसिला बे-कराँ है
ज़िंदगी कारवाँ कारवाँ है

हासिल-ए-नरमी-ए-शबनम-ओ-गिल
आतिश-ए-ग़म का सैल-ए-रवाँ है

हर नफ़स में तिरी आहटें हैं
हर नफ़स ज़िंदगी का निशाँ है

अपनी वीरानियों पर अभी तक
दिल को शादाबियों का गुमाँ है

हम-नफ़स दिल धड़कते हैं जब तक
कारोबार-ए-मोहब्बत जवाँ है

तोहमत-ए-मय-कशी भी उठाई
तिश्नगी है कि शो'ला-ब-जाँ है

उन के दामन में भी फूल होते
जिन से रा'नाई-ए-गुल्सिताँ है