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शर्तें जो बंदगी में लगाना रवा हुआ | शाही शायरी
sharten jo bandagi mein lagana rawa hua

ग़ज़ल

शर्तें जो बंदगी में लगाना रवा हुआ

शाद लखनवी

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शर्तें जो बंदगी में लगाना रवा हुआ
ऐ वाइ'ज़ों नमाज़ न ठहरी जुआ हुआ

उभरा जो रू-सियाह तुनुक-ज़र्फ़ क्या हुआ
हद से सिवा जो ख़ाल हुआ वो मसा हुआ

पूछो न कू-ए-यार-ए-अदम की मुसाफ़िरो
ढर्रा है सू-ए-गोर-ए-ग़रीबाँ लगा हुआ

सूखा हवा-ए-ग़म से जो कुछ ताज़गी हुई
मैं वो शजर हूँ ख़ुश्क हुआ जब हरा हुआ

सानी मुहाल है सनम-ए-लाजवाब का
पैदा कोई ख़ुदा का नहीं दूसरा हुआ

मिस्ल-ए-हबाब दम में फ़ना हो जो आदमी
पानी का बुलबुला न हुआ और क्या हुआ

वो दिल-जला हूँ जिस में मिरी ख़ाक मिल गई
जो नख़्ल इस ज़मीं पे हुआ आग का हुआ

नाख़ुन-ख़राशियों से जराहत जो बढ़ चले
नासूर और ज़ख़्म-ए-कुहन में सिवा हुआ

हँसते तो गुल-रुख़ों से हैं मिस्ल-ए-दहान-ए-ज़ख़्म
लेकिन है आबले की तरह दिल दुखा हुआ

साकित ज़बान हो गई ऐ 'शाद' मरते दम
क्या बंद अंदलीब मिरा बोलता हुआ