EN اردو
शर्म-आलूद कहीं दीदा-ए-ग़म्माज़ न हो | शाही शायरी
sharm-alud kahin dida-e-ghammaz na ho

ग़ज़ल

शर्म-आलूद कहीं दीदा-ए-ग़म्माज़ न हो

पंडित जगमोहन नाथ रैना शौक़

;

शर्म-आलूद कहीं दीदा-ए-ग़म्माज़ न हो
दिलबरी का कोई पहलू नज़र-अंदाज़ न हो

दूर से दर्द-भरी एक सदा आती है
मेरे टूटे हुए दिल की कहीं आवाज़ न हो

लज़्ज़त-ए-दर्द का महजूर सहारा क्यूँ लें
लुत्फ़-ए-तन्हाई तो जब है कोई दम-साज़ न हो

शुक्र सद शुक्र कि ऐ शौक़ मिरा ताइर-ए-दिल
बाल-ओ-पर होते हुए माइल-ए-परवाज़ न हो

मुंतज़िर बज़्म है आ जाएँ ब-सद इश्वा-ए-ओ-नाज़
शर्त ये है कि निगाह-ए-ग़लत-अंदाज़ न हो

ये भी क्या दौर है नैरंगी-ए-आलम तेरा
मुर्ग़-ए-आसूदा चमन ज़मज़मा-परवाज़ न हो

कसरत-ए-जल्वा में गुम है दिल हंगामा-फरोज़
बे-ख़ुदी कहती है मेरा कोई हमराज़ न हो

सर-ए-मक़्तल कोई इस शान से आए ऐ 'शौक़'
लब पे ए'जाज़ न हो चश्म फ़ुसूँ-साज़ न हो