शराब-ए-इश्क़ में क्या जाने क्या तासीर होती है
कहीं ये ज़हर होती है कहीं इक्सीर होती है
न मफ़्हूम उस का फ़ुर्क़त है न मंशा वस्ल है उस का
मोहब्बत अस्ल में इक ख़्वाब-ए-ख़ुद-ता'बीर होती है
जुदा हो कर इसी में जज़्ब हो जाती है फिर इक दिन
मोहब्बत आफ़्ताब-ए-हुस्न की तनवीर होती है
मिरा ज़ौक़-ए-नज़र हो या तिरा फ़ैज़-ए-तसव्वुर हो
मिरे आईने में अक्सर तिरी तस्वीर होती है
शिकायत भी मोहब्बत ही में दाख़िल है मगर 'बिस्मिल'
मोहब्बत बे-नियाज़-ए-शिकवा-ए-तक़दीर होती है
ग़ज़ल
शराब-ए-इश्क़ में क्या जाने क्या तासीर होती है
बिस्मिल सईदी

