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शमशीर है सिनाँ है किसे दूँ किसे न दूँ | शाही शायरी
shamshir hai sinan hai kise dun kise na dun

ग़ज़ल

शमशीर है सिनाँ है किसे दूँ किसे न दूँ

अमीर मीनाई

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शमशीर है सिनाँ है किसे दूँ किसे न दूँ
इक जान-ए-ना-तवाँ है किसे दूँ किसे न दूँ

मेहमान इधर हुमा है उधर है सग-ए-हबीब
इक मुश्त उस्तुखाँ है किसे दूँ किसे न दूँ

दरबाँ हज़ार उस के यहाँ एक नक़्द-ए-जाँ
माल इस क़दर कहाँ है किसे दूँ किसे न दूँ

बुलबुल को भी है फूलों की गुलचीं को भी तलब
हैरान बाग़बाँ है किसे दूँ किसे न दूँ

सब चाहते हैं उस से जो वादा विसाल का
कहता है वो ज़बाँ है किसे दूँ किसे न दूँ

शहज़ादी दुख़्त-ए-रज़ के हज़ारों हैं ख़्वास्त-गार
चुप मुर्शिद-ए-मुग़ाँ है किसे दूँ किसे न दूँ

यारों को भी है बोसे की ग़ैरों को भी तलब
शश्दर वो जान-ए-जाँ है किसे दूँ किसे न दूँ

दिल मुझ से माँगते हैं हज़ारों हसीं 'अमीर'
कितना ये अरमुग़ाँ है किसे दूँ किसे न दूँ