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शमीम-ए-गेसू-ए-मुश्कीन-ए-यार लाई है | शाही शायरी
shamim-e-gesu-e-mushkin-e-yar lai hai

ग़ज़ल

शमीम-ए-गेसू-ए-मुश्कीन-ए-यार लाई है

रईस अमरोहवी

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शमीम-ए-गेसू-ए-मुश्कीन-ए-यार लाई है
सबा उड़ा के पयाम-ए-बहार लाई है

किसी उरूस-ए-शबिस्तान-ए-अल्फ़-लैला का
चुरा के इक नफ़स-ए-मुश्क-बार लाई है

जो रहरवान-ए-तरीक़-ए-तलब हैं उन के लिए
ग़ुबार-ए-मंज़िल-ए-शहर-ए-निगार लाई है

कहो कि दीदा-ओ-दिल के लिए नसीम-ए-सहर
पयाम-ए-ग़मज़ा-ए-आलम-शिकार लाई है

कहो कि ख़िर्मन-ए-जाँ के लिए शमीम-ए-बहार
सलाम-ए-शो'ला-ओ-बर्क़-ओ-शरार लाई है

जो ज़ाइरीन-ए-हरीम-ए-वफ़ा हैं उन के लिए
नवेद-ए-रहमत-ए-परवरदिगार लाई है

वतन की याद किसी बे-दयार की ख़ातिर
वतन से मुज़्दा-ए-अहल-ए-दयार लाई है