शम्अ के तेरे करिश्मे ने दिल-अफ़रोज़ी की
इन ने तब दूर ये महफ़िल की सियह-रोज़ी की
आए बू गर्मी-ए-ख़ुर्शीद से दिल-सोज़ी की
सरगुज़िश्त अपनी कहीं हम जो सियह-रोज़ी की
आह परवाना ये क्यूँ शम्अ पे जलता होगा
रात को बज़्म में बू आती थी जाँ-सोज़ी की
क़हत-ए-ग़म-ख़्वार से अज़-बस-कि ये दिल जलता था
दिल के जलने पे मिरी शम्अ ने दिल-सोज़ी की
अश्क का तार ले आँखों ने मिज़ा की सोज़न
जम्अ कर लख़्त-ए-जिगर ज़ोर-ए-जिगर-सोज़ी की
महर-ओ-मह अब्र-ओ-हवा तेरे लिए सरगर्दां
बंदा सुनता है अबस फ़िक्र न कर रोज़ी की
इश्क़ में जलते हैं रौशन है ये उन पर.....
शम्अ को तर्ज़ सिखाया है दिल-अफ़रोज़ी की
ग़ज़ल
शम्अ के तेरे करिश्मे ने दिल-अफ़रोज़ी की
इश्क़ औरंगाबादी

