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शजर आराम-दह होने लगे हैं | शाही शायरी
shajar aaram-dah hone lage hain

ग़ज़ल

शजर आराम-दह होने लगे हैं

नियाज़ हुसैन लखवेरा

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शजर आराम-दह होने लगे हैं
परिंदे रात-दिन सोने लगे हैं

ये कैसा सानेहा अब के हुआ है
सभी छोटे बड़े रोने लगे हैं

मोहब्बत बाँझ धरती बन गई है
बदन अब बे-समर होने लगे हैं

इस अहद-ए-नारवा के अहल-ए-दानिश
कभी ठिगने कभी बौने लगे हैं

सदाएँ बे-सदा अल्फ़ाज़ बंजर
क़लम वीरान से होने लगे हैं

बही-ख़्वाहों को ख़ुश रखने की ख़ातिर
हम अपने आप पे रोने लगे हैं