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शैख़ को काबे से जो मक़्सूद है | शाही शायरी
shaiKH ko kabe se jo maqsud hai

ग़ज़ल

शैख़ को काबे से जो मक़्सूद है

जोशिश अज़ीमाबादी

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शैख़ को काबे से जो मक़्सूद है
वो कुनिश्त-ए-दिल ही में मौजूद है

मेरे जलने की किसी को क्या ख़बर
सोज़िश-ए-दिल आतिश-ए-बे-दूद है

ने हरम से काम है ने दैर से
ख़ाना-ए-दिल ही मिरा मस्जूद है

फ़र्क़ मत कर आशिक़ ओ माशूक़ में
ख़ुद अयाज़ और आप ही महमूद है

क्या परी क्या हूर क्या जिन्न-ओ-बशर
सब में वो शायद मिरा मशहूद है

मशरब-ए-उश्शाक़ में ऐ ज़ाहिदो
उस का जो मख़्लूक़ है माबूद है

संग ओ आहन को ये करती है गुदाज़
आह है ये नग़्मा-ए-दाऊद है

किस से ऐ 'जोशिश' कहूँ मैं दर्द-ए-दिल
मेरे उस के बोलना मफ़क़ूद है