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शहर ख़ामोश है सब नेज़ा-ओ-ख़ंजर चुप हैं | शाही शायरी
shahar KHamosh hai sab neza-o-KHanjar chup hain

ग़ज़ल

शहर ख़ामोश है सब नेज़ा-ओ-ख़ंजर चुप हैं

शाहिद माहुली

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शहर ख़ामोश है सब नेज़ा-ओ-ख़ंजर चुप हैं
कैसी उफ़्ताद पड़ी है कि सितमगर चुप हैं

ख़ूँ का सैलाब था जो सर से अभी गुज़रा है
बाम-ओ-दर अब भी सिसकते हैं मगर घर चुप हैं

चार-सू दश्त में फैला है उदासी का धुआँ
फूल सहमे हैं हवा ठहरी है मंज़र चुप हैं

मुतमइन कोई नहीं नामा-ए-आमाल से आज
मुस्कुराता है ख़ुदा सारे पयम्बर चुप हैं

लौट के आती नहीं अब तो सदा-ए-गुम्बद
चुप हैं सब दैर-ओ-हरम मस्नद-ओ-मिम्बर चुप हैं

मैं जो ख़ामोश था इक शोर था हर महफ़िल में
मेरी गोयाई पर अब सारे सुख़नवर चुप हैं