शहर ख़ामोश है सब नेज़ा-ओ-ख़ंजर चुप हैं
कैसी उफ़्ताद पड़ी है कि सितमगर चुप हैं
ख़ूँ का सैलाब था जो सर से अभी गुज़रा है
बाम-ओ-दर अब भी सिसकते हैं मगर घर चुप हैं
चार-सू दश्त में फैला है उदासी का धुआँ
फूल सहमे हैं हवा ठहरी है मंज़र चुप हैं
मुतमइन कोई नहीं नामा-ए-आमाल से आज
मुस्कुराता है ख़ुदा सारे पयम्बर चुप हैं
लौट के आती नहीं अब तो सदा-ए-गुम्बद
चुप हैं सब दैर-ओ-हरम मस्नद-ओ-मिम्बर चुप हैं
मैं जो ख़ामोश था इक शोर था हर महफ़िल में
मेरी गोयाई पर अब सारे सुख़नवर चुप हैं
ग़ज़ल
शहर ख़ामोश है सब नेज़ा-ओ-ख़ंजर चुप हैं
शाहिद माहुली

