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शगुफ़्तगी से गए, दिल-गिरफ़्तगी से गए | शाही शायरी
shaguftagi se gae, dil-giraftagi se gae

ग़ज़ल

शगुफ़्तगी से गए, दिल-गिरफ़्तगी से गए

इरफ़ान सत्तार

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शगुफ़्तगी से गए, दिल-गिरफ़्तगी से गए
हम आज ख़ल्वत-ए-जाँ में भी बे-दिली से गए

गिला करें भी तो किस से वो ना-मुराद-ए-जुनूँ
जो ख़ुद ज़वाल की जानिब बड़ी ख़ुशी से गए

सुना है अहल-ए-ख़िरद का है दौर-ए-आइंदा
ये बात है तो समझ लो कि हम अभी से गए

ख़ुदा करे न कभी मिल सके दवाम-ए-विसाल
जिएँगे ख़ाक अगर तेरे ख़्वाब ही से गए

है ये भी ख़ौफ़ हमें बे-तवज्जोही से सिवा
कि जिस नज़र से तवक़्क़ो' है गिर उसी से गए

मक़ाम किस का कहाँ है, बुलंद किस से है कौन?
मियाँ ये फ़िक्र करोगे तो शाइ'री से गए

हर एक दर पे जबीं टेकते ये सज्दा-गुज़ार
ख़ुदा की खोज में निकले थे और ख़ुदी से गए

समझते क्यूँ नहीं ये शाएर-ए-करख़्त-नवा
सुख़न कहाँ का जो लहजे की दिलकशी से गए

गली थी सहन का हिस्सा हमारे बचपन में
मकाँ बड़े हुए लेकिन कुशादगी से गए

बराए अहल-ए-जहाँ लाख कज-कुलाह थे हम
गए हरीम-ए-सुख़न में तो आजिज़ी से गए

ये तेज़ रौशनी रातों का हुस्न खा गई है
तुम्हारे शहर में हम अपनी चाँदनी से गए

फ़क़ीह-ए-शहर की हर बात मान लो चुप-चाप
अगर सवाल उठाया, तो ज़िंदगी से गए

न पूछिए कि वो किस कर्ब से गुज़रते हैं
जो आगही के सबब ऐश-ए-बंदगी से गए

उठाओ रख़्त-ए-सफ़र, आओ अब चलो 'इरफ़ान'
हसीं यहाँ के तो सब ख़ू-ए-दिलबरी से गए