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शगुफ़्ता होते ही मुरझा गई कली अफ़सोस | शाही शायरी
shagufta hote hi murjha gai kali afsos

ग़ज़ल

शगुफ़्ता होते ही मुरझा गई कली अफ़सोस

शाद लखनवी

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शगुफ़्ता होते ही मुरझा गई कली अफ़सोस
बहार-ए-बाग़ इधर आई उधर गई अफ़सोस

कि तुम अख़ीर भी कहने न हाल-ए-दिल पाए
ज़बान बंद हुई बात करते ही अफ़सोस

इसी बहाने से मुँह देखते हसीनों का
सफ़ा-ए-दिल न हुई अपनी आरसी अफ़सोस

हुज़ूर-ए-क़ैस पहन कर जुनूँ में क्या जाएँ
क़बा-ए-तन है सरापा नुची खुची अफ़सोस

वबाल-ए-दोश रहा सर भी ना-तवानी से
मिला न कोई हमें तेग़ का धनी अफ़सोस

नज़र से गिर के ये दिल-ए-ग़म हुआ कहीं न मिला
जुनूँ में ख़ाक भी छानी गली गली अफ़सोस

वो कुश्तनी हैं जो माही का भेस भी बदला
हलाल हो गए मछली से भी छुरी अफ़सोस

मज़ार-ए-क़ैस पे आई न एक लैला क्या
किसी ने बात न पूछी ग़रीब की अफ़सोस

बरहनगी का तो मरने पे ग़म नहीं लेकिन
कफ़न खसूट से शर्मिंदगी हुई अफ़सोस

ख़िज़ाँ के हाथ से रोने की जा है ख़ंदा-ए-गुल
बिसूरती है ये हँसती नहीं कली अफ़सोस

किसे सुनाएँ ये हम रेख़्ता ज़बाँ ऐ 'शाद'
जनाब-ए-'मीर' न 'मिर्ज़ा' न 'मुसहफ़ी' अफ़सोस