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शबीह-ए-ख़ंजर-ए-क़ातिल बना कर | शाही शायरी
shabih-e-KHanjar-e-qatil bana kar

ग़ज़ल

शबीह-ए-ख़ंजर-ए-क़ातिल बना कर

मिर्ज़ा आसमान जाह अंजुम

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शबीह-ए-ख़ंजर-ए-क़ातिल बना कर
रक्खी सीने में हम ने दिल बना कर

जुनूँ दिल को न मेरे बैठने दे
उठा दे मस्त-ए-ला-याक़िल बना कर

निगाह-ए-बद का अंदेशा है मुझ को
वो बैठे हैं जबीं पर तिल बना कर

जो क़ाबू तुझ पे होता मेरा ऐ जान
तुझे पहलू में रखता दिल बना कर

डराया पुर्सिश-ए-महशर से नाहक़
पशेमाँ हूँ तुझे क़ातिल बना कर

उठाया हश्र में भी मुझ को उस ने
सवाल-ए-दीद का साइल बना कर

उड़ा ले चल हवा-ए-शौक़ मुझ को
ग़ुबार-ए-रहरव-ए-मंज़िल बना कर

निकाला आरज़ू-ए-दिल को 'अंजुम'
तमन्ना-ए-दिल-ए-बिस्मिल बना कर