शब-ए-ज़िंदगानी सहर हो गई
बहर-कैफ़ अच्छी बसर हो गई
न समझे कि शब क्यूँ सहर हो गई
इधर की ज़मीं सब उधर हो गई
ज़माने की बिगड़ी कुछ ऐसी हवा
कि बे-ग़ैरती भी हुनर हो गई
अमाइद ने की वज़्अ' जो इख़्तियार
वही सब को मद्द-ए-नज़र हो गई
गए जो निकल दाम-ए-तज़वीर से
हज़ीमत ही इन की ज़फ़र हो गई
ज़मीं मुंक़लिब आसमाँ चर्ख़-ज़न
इक़ामत भी हम को सफ़र हो गई
मिटा डालिए लौह-ए-दिल से ग़ुबार
किसी से ख़ता भी अगर हो गई
बराह-ए-करम उस को तय कीजिए
जो अन-बन किसी बात पर हो गई
न करना था बिज़्ज़िद मदावा-ए-ग़म
बड़ी चूक ऐ चारा-गर हो गई
ये हंगामा-आरा हैं सब बे-ख़बर
वो चुप हैं जिन्हें कुछ ख़बर हो गई
ग़ज़ल
शब-ए-ज़िंदगानी सहर हो गई
इस्माइल मेरठी

