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शब-ए-विसाल तुलूअ' आफ़्ताब कैसे हुआ | शाही शायरी
shab-e-visal tulua aaftab kaise hua

ग़ज़ल

शब-ए-विसाल तुलूअ' आफ़्ताब कैसे हुआ

मुनीर सैफ़ी

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शब-ए-विसाल तुलूअ' आफ़्ताब कैसे हुआ
ज़मीं पे इतना बड़ा इंक़लाब कैसे हुआ

सितारा मू-ए-बदन रुख़ गुलाब कैसे हुआ
तुम्हारा जिस्म हवस की किताब कैसे हुआ

लबों से काम बुरिश का लिया गया होगा
कि अंग अंग तिरा मेहर-ताब कैसे हुआ

ज़रूर लड़कियाँ पानी में तैरती होंगी
नहीं तो सारा समुंदर शराब कैसे हुआ

कहाँ से आ गए ख़ुशियों के बावरे पंछी
कि मुझ पे बंद हर इक ग़म का बाब कैसे हुआ

ये किस ने छीन ली बीनाई आसमानों से
ज़मीं के जिस्म पे नाज़िल अज़ाब कैसे हुआ

किसी ने याद के कंकर ज़रूर फेंके हैं
ख़मोश झील में ये इज़्तिराब कैसे हुआ

उसे समझने को इक उम्र चाहिए जानाँ
'मुनीर' अस्ल में तेरा ख़राब कैसे हुआ