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शब ढली मेरी और सहर न हुई | शाही शायरी
shab Dhali meri aur sahar na hui

ग़ज़ल

शब ढली मेरी और सहर न हुई

अफ़ीफ़ सिराज

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शब ढली मेरी और सहर न हुई
हद हुई आप को ख़बर न हुई

आप कहते थे पुर-ख़तर जितनी
सख़्त उतनी भी रहगुज़र न हुई

रह गया दर्द दिल के पहलू में
ये जो उल्फ़त थी दर्द-ए-सर न हुई

वक़्त-ए-आख़िर खुला है ये उक़्दा
भोली सूरत भी बे-ज़रर न हुई

क्या से क्या कह रहे हैं आप 'सिराज'
आप की बात बारवर न हुई