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शायद रुख़-ए-हयात से सरके नक़ाब और | शाही शायरी
shayad ruKH-e-hayat se sarke naqab aur

ग़ज़ल

शायद रुख़-ए-हयात से सरके नक़ाब और

सिराजुद्दीन ज़फ़र

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शायद रुख़-ए-हयात से सरके नक़ाब और
भर दो मिरे सुबू में शराब-ए-गुलाब और

होगी मिरे सुबू से नुमूद-ए-हज़ार-सुब्ह
उभरेंगे इस उफ़ुक़ से अभी आफ़्ताब और

आती है कू-ए-दार-ओ-रसन से सदा हनूज़
आए इधर जो है कोई ख़ाना-ख़राब और

मख़मूर-ए-बू-ए-ज़ुल्फ़ न आएँगे होश में
छिड़के अभी नसीम-ए-बहाराँ गुलाब और

ऐ वारिसान-ए-सतवत-परवेज़ होशियार
दामान-ए-वक़्त में हैं अभी इंक़लाब और

आई 'ज़फ़र' जो रात ज़बाँ पर हदीस-ए-दोस्त
नागाह बढ़ गई मिरे जौहर की आब और