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शायद अभी है राख में कोई शरार भी | शाही शायरी
shayad abhi hai rakh mein koi sharar bhi

ग़ज़ल

शायद अभी है राख में कोई शरार भी

अदा जाफ़री

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शायद अभी है राख में कोई शरार भी
क्यूँ वर्ना इंतिज़ार भी है इज़्तिरार भी

ध्यान आ गया था मर्ग-ए-दिल-ए-ना-मुराद का
मिलने को मिल गया है सुकूँ भी क़रार भी

अब ढूँडने चले हो मुसाफ़िर को दोस्तो
हद-ए-निगाह तक न रहा जब ग़ुबार भी

हर आस्ताँ पे नासिया फ़र्सा हैं आज वो
जो कल न कर सके थे तेरा इंतिज़ार भी

इक राह रुक गई तो ठिठुक क्यूँ गईं 'अदा'
आबाद बस्तियाँ हैं पहाड़ों के पार भी