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शाने की हर ज़बाँ से सुने कोई लाफ़-ए-ज़ुल्फ़ | शाही शायरी
shane ki har zaban se sune koi laf-e-zulf

ग़ज़ल

शाने की हर ज़बाँ से सुने कोई लाफ़-ए-ज़ुल्फ़

बहादुर शाह ज़फ़र

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शाने की हर ज़बाँ से सुने कोई लाफ़-ए-ज़ुल्फ़
चीरे है सीना रात को ये मू-शिगाफ़-ए-ज़ुल्फ़

जिस तरह से कि काबे पे है पोशिश-ए-सियाह
इस तरह इस सनम के है रुख़ पर ग़िलाफ़-ए-ज़ुल्फ़

बरहम है इस क़दर जो मिरे दिल से ज़ुल्फ़-ए-यार
शामत-ज़दा ने क्या किया ऐसा ख़िलाफ़-ए-ज़ुल्फ़

मतलब न कुफ़्र ओ दीं से न दैर ओ हरम से काम
करता है दिल तवाफ़-ए-इज़ार ओ तवाफ़-ए-ज़ु़ल्फ़

नाफ़-ए-ग़ज़ाल-ए-चीं है कि है नाफ़ा-ए-ततार
क्यूँकर कहूँ कि है गिरह-ए-ज़ुल्फ़ नाफ़-ए-ज़ुल्फ़

आपस में आज दस्त-ओ-गरेबाँ है रोज़ ओ शब
ऐ मेहर-वश ज़री का नहीं मू-ए-बाफ़-ए-ज़ुल्फ़

कहता है कोई जीम कोई लाम ज़ुल्फ़ को
कहता हूँ मैं 'ज़फ़र' कि मुसत्तह है काफ़-ए-ज़ुल्फ़