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शाना तो छुटा ज़ुल्फ़-ए-परेशाँ से उलझ कर | शाही शायरी
shana to chhuTa zulf-e-pareshan se ulajh kar

ग़ज़ल

शाना तो छुटा ज़ुल्फ़-ए-परेशाँ से उलझ कर

मुनव्वर ख़ान ग़ाफ़िल

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शाना तो छुटा ज़ुल्फ़-ए-परेशाँ से उलझ कर
सुलझा न ये दिल काकुल-ए-पेचाँ से उलझ कर

लेता है ख़बर कौन असीरान-ए-बला की
मर मर गए तारीकी-ए-ज़िंदाँ से उलझ कर

ज़ोरों पे चढ़ा है ये मिरा पंजा-ए-वहशत
दामन से उलझता है गरेबाँ से उलझ कर

दीवाने ख़त-ओ-ज़ुल्फ़ के सौदे की लहर में
क्या क्या न बके सुम्बुल-ओ-रैहाँ से उलझ कर

आसार-ए-क़यामत कहीं जल्दी हो नुमायाँ
घबराए है जी अब शब-ए-हिज्राँ से उलझ कर

डरता हूँ कहीं ताब नज़ाकत से न खावे
मू-ए-कमर उस ज़ुल्फ़-ए-परेशाँ से उलझ कर

सौ पेच में आया है हमारा दिल-ए-सद-चाक
शाना की तरह काकुल-ए-पेचाँ से उलझ कर

गिर्दाब-ए-बला में दिल-ए-आशिक़ को फँसाया
बाली ने तिरी ज़ुल्फ़-ए-परेशाँ से उलझ कर

तय कर गए सब काबा-ए-मक़्सूद की मंज़िल
इक रह गए हम नख़्ल-ए-मुग़ीलाँ से उलझ कर

दौड़ा हुआ जाता है रक़ीब उस की गली को
यारब ये गिरे रस्ते में दामाँ से उलझ कर

जज़्ब-ए-दिल-ए-मजनूँ ने किया काम जो अपना
नाक़ा न रुका ख़ार-ए-बयाबाँ से उलझ कर

यारब मैं उसे देखूँ अगर दीदा-ए-बद से
रह जाए नज़र पंजा-ए-मिज़्गाँ से उलझ कर

ऐ तीर-फ़गन बस है यही मुझ को तमन्ना
छूटे न रग-ए-जाँ तिरे पैकाँ से उलझ कर

मत बहस रक़ीबान-ए-कज-अंदेश से 'ग़ाफ़िल'
बे-क़द्र न हो ऐसे सफ़ीहाँ से उलझ कर