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शामिल-ए-कारवाँ तो हम भी हैं | शाही शायरी
shamil-e-karwan to hum bhi hain

ग़ज़ल

शामिल-ए-कारवाँ तो हम भी हैं

इसहाक़ अतहर सिद्दीक़ी

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शामिल-ए-कारवाँ तो हम भी हैं
तेरी जानिब रवाँ तो हम भी है

ये हक़ीक़त नहीं तो फिर क्या है
या'नी वहम-ओ-गुमाँ तो हम भी हैं

बार-ए-हिजरत सरों पे है अपने
इतने बे-ख़ानुमाँ तो हम भी हैं

कह रहे हैं ख़िज़ाँ ज़दा चेहरे
ऐ बहारो यहाँ तो हम भी हैं

सच न मानो तो झूट ही कह लो
इक रुख़-ए-दास्ताँ तो हम भी हैं

हम को ख़ाक-ए-रह-ए-सफ़र मत जान
ऐ ज़मीं आसमाँ तो हम भी हैं

सिर्फ़ मा'नी की वुसअतें ही नहीं
लफ़्ज़ के दरमियाँ तो हम भी हैं