शामिल-ए-कारवाँ तो हम भी हैं
तेरी जानिब रवाँ तो हम भी है
ये हक़ीक़त नहीं तो फिर क्या है
या'नी वहम-ओ-गुमाँ तो हम भी हैं
बार-ए-हिजरत सरों पे है अपने
इतने बे-ख़ानुमाँ तो हम भी हैं
कह रहे हैं ख़िज़ाँ ज़दा चेहरे
ऐ बहारो यहाँ तो हम भी हैं
सच न मानो तो झूट ही कह लो
इक रुख़-ए-दास्ताँ तो हम भी हैं
हम को ख़ाक-ए-रह-ए-सफ़र मत जान
ऐ ज़मीं आसमाँ तो हम भी हैं
सिर्फ़ मा'नी की वुसअतें ही नहीं
लफ़्ज़ के दरमियाँ तो हम भी हैं
ग़ज़ल
शामिल-ए-कारवाँ तो हम भी हैं
इसहाक़ अतहर सिद्दीक़ी

