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शाम तन्हाई धुआँ उठता बराबर देखते | शाही शायरी
sham tanhai dhuan uThta barabar dekhte

ग़ज़ल

शाम तन्हाई धुआँ उठता बराबर देखते

अख़्तर होशियारपुरी

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शाम तन्हाई धुआँ उठता बराबर देखते
फिर सर-ए-शब चाँद उभरने का भी मंज़र देखते

जुम्बिश-ए-लब में मिरी आवाज़ की तस्वीर है
काश वो भी बोलते लफ़्ज़ों के पैकर देखते

साहिलों पर सीपियाँ थीं और हवा का शोर था
पानियों में डूबते तो कोई गौहर देखते

खिड़कियों की ओट से अंदाज़ा हो सकता नहीं
शहर का अहवाल तुम घर से निकल कर देखते

आने वालों के लिए दरवाज़े रहते हैं खुले
जाने वाले भी कभी मुड़ कर सू-ए-दर देखते

बारिशों में भीगना जिस्मों का उजला बाँकपन
रास्तों की गर्द भी ये लोग सर पर देखते

वो जिन्हें दस्तार की हसरत रही है उम्र भर
मेरे शानों पर कभी 'अख़्तर' मिरा सर देखते