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शाम से पहले घर गए होते | शाही शायरी
sham se pahle ghar gae hote

ग़ज़ल

शाम से पहले घर गए होते

रसा चुग़ताई

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शाम से पहले घर गए होते
या सर-ए-शाम मर गए होते

इस गदायाना ज़िंदगी से तो
वज़'अ-दाराना मर गए होते

यूँ भी इक उम्र राएगाँ गुज़री
यूँ भी कुछ दिन गुज़र गए होते

तू जो दिल से उतर गया होता
ज़ख़्म दिल के उभर गए होते

हम न होते तो हादसात-ए-जहाँ
जाने किस किस के सर गए होते

कोई दामन-कश-ए-ख़याल न था
वर्ना हम भी ठहर गए होते

शम-ए-महफ़िल न थे कि महफ़िल में
ले के हम ज़ख़्म-ए-सर गए होते