शाम से पहले घर गए होते
या सर-ए-शाम मर गए होते
इस गदायाना ज़िंदगी से तो
वज़'अ-दाराना मर गए होते
यूँ भी इक उम्र राएगाँ गुज़री
यूँ भी कुछ दिन गुज़र गए होते
तू जो दिल से उतर गया होता
ज़ख़्म दिल के उभर गए होते
हम न होते तो हादसात-ए-जहाँ
जाने किस किस के सर गए होते
कोई दामन-कश-ए-ख़याल न था
वर्ना हम भी ठहर गए होते
शम-ए-महफ़िल न थे कि महफ़िल में
ले के हम ज़ख़्म-ए-सर गए होते
ग़ज़ल
शाम से पहले घर गए होते
रसा चुग़ताई

