EN اردو
शाम-ए-तकलीफ़ की दुनिया में सहर हो तो सही | शाही शायरी
sham-e-taklif ki duniya mein sahar ho to sahi

ग़ज़ल

शाम-ए-तकलीफ़ की दुनिया में सहर हो तो सही

मिर्ज़ा अल्ताफ़ हुसैन आलिम लखनवी

;

शाम-ए-तकलीफ़ की दुनिया में सहर हो तो सही
हाए कम-बख़्त कहीं दर्द-ए-जिगर हो तो सही

बैठने वाले न बैठेंगे कभी महफ़िल में
ओ सितमगर तिरे दिल में मिरा घर हो तो सही

दिल-ए-बेताब का मिलना नहीं मुश्किल लेकिन
हाथ भर का किसी सीने में जिगर हो तो सही

हम ये समझेंगे कि दिल था ही नहीं सीने में
उन की दुज़्दीदा निगाहों का असर हो तो सही

छुप गया आँखों से इक नूर बस इतना कह कर
क्या बताने में हर्ज था कोई घर हो तो सही

कह के ये फिर गई थीं काहकशाँ से आँखें
तुझ से मिलती हुई वो राहगुज़र हो तो सही

फिर दिखाऊँगा मैं अनमोल जवाहर 'आलिम'
मिरी क़िस्मत से कोई अहल-ए-नज़र हो तो सही