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शाम-ए-बे-मेहर में इक याद का जुगनू चमका | शाही शायरी
sham-e-be-mehar mein ek yaad ka jugnu chamka

ग़ज़ल

शाम-ए-बे-मेहर में इक याद का जुगनू चमका

फ़रासत रिज़वी

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शाम-ए-बे-मेहर में इक याद का जुगनू चमका
और फिर एक ही चेहरा था कि हर-सू चमका

ऐ चराग़-ए-निगह-ए-यार मैं जाँ से गुज़रा
अब मुझे क्या जो पए दिल-ज़दगाँ तो चमका

रोज़ मिलते थे तो बे-रंग था तेरा मिलना
दूर रहने से तिरे क़ुर्ब का जादू चमका

दिल में फिर बुझने लगा ज़ब्त का तारा कोई
फिर मिरी नोक-ए-मिज़ा पर कोई आँसू चमका

ताज-ए-ख़ुसरव की चमक माँद पड़ी जाती है
शहर के कूचा-ओ-बाज़ार में लोहू चमका

खो गया है उन्ही तारीक ख़लाओं में कहीं
वो भी क्या चाँद था जिस से मिरा पहलू चमका

मैं ने जाना कि 'फ़रासत' कोई ग़म-ख़्वार आया
अक्स-ए-महताब कुछ इस तरह लब-ए-जू चमका