शाम ढले उस बज़्म-ए-तरब में मेरा जाना ख़ूब हुआ
मुझ को अचानक सामने पा कर वो कितना महजूब हुआ
दश्त-ए-सितम में कितनी सलीबें इस्तादा थीं चार-तरफ़
शाह के हाथ पे बैअ'त कर ली कोई न याँ मस्लूब हुआ
रुस्वाई के साए हमेशा पीछा करते रहते हैं
मुझ से गुरेज़ाँ हो कर भी वो मुझ से ही मंसूब हुआ
कूचा-ए-यार में जाना हो तो तर्क-ए-अना है पहला क़दम
इश्क़ किसी से क्या करता वो जो अपना महबूब हुआ
उजड़ी जब से महफ़िल-ए-याराँ तौर बदल गए जीने के
ज़ख़्म मिरा पैराहन ठहरा दर्द मिरा उस्लूब हुआ
अहद-ए-नौ की ईजादों से लज़्ज़त-ए-नामा-बरी भी गई
शीशे पर कुछ हर्फ़ लिखे हैं ये कैसा मक्तूब हुआ
अपने ऐब पे चश्म-ए-ज़माना मुश्किल ही से जाती है
बे-चेहरा थे देखने वाले आईना मा'तूब हुआ
रह गए कुछ यादों के साए कुछ लफ़्ज़ों की रौशनियाँ
आख़िर मेरी उम्र का सूरज ढलते ढलते ग़ुरूब हुआ
ग़ज़ल
शाम ढले उस बज़्म-ए-तरब में मेरा जाना ख़ूब हुआ
फ़रासत रिज़वी

